फकीरा चलते-चलते
यमुना टाइम्स (राकेश भारतीय )
“नल में ज़हर, फाइल में धूल और पहाड़ों की चीख”
आज फकीरा आम जनता के बुलावे पर वार्ड 12 पहुंचा सुबह नल के पास खड़ा था। पानी आया… पर प्यास बुझाने लायक नहीं।रंग ऐसा कि लगता था, नल से पानी नहीं सरकारी रिपोर्ट बह रही हो।
एक औरत बोली—“फकीरा, ये पानी पीएँ तो बीमारी,ना पीएँ तो प्यास…” फकीरा चुप रहा। क्योंकि इस सवाल का जवाब किसी फाइल में नहीं मिलता।
पानी साफ़, काग़ज़ पर
फकीरा दफ्तर पहुँचा।
एक अफसर बोला—
“सब ठीक है, रिपोर्ट में पानी बिल्कुल साफ़ है।” फकीरा ने पूछा—
“साहब, आपने पानी पिया?” अफसर हँसा—“अरे नहीं… वो तो घर से लाया हूँ।”
फकीरा ने सोचा—जो खुद नहीं पी सकता, वो दूसरों को कैसे पिलाएगा?
भ्रष्टाचार की खुशबू
फाइलों के ढेर के बीच
फकीरा ने देखा—एक काम बिना चढ़ावे के हिलता नहीं। एक युवक बोला—
“फकीरा, बिना रिश्वत कोई सुनता ही नहीं।”फकीरा बोला—“भ्रष्टाचार अब अपराध नहीं, प्रक्रिया बन चुका है।”
पहाड़ बोलते हैं
फकीरा नदी और जंगलों की तरफ गया।ट्रक भर-भरकर पत्थर ले जा रहे थे।
फकीरा ने पूछा—“इतनी खुदाई किसके लिए?” जवाब मिला—“विकास के लिए।”
फकीरा ने पहाड़ की तरफ देखा—उसका सीना छलनी था। फकीरा बोला—“अगर यही विकास है, तो विनाश की पहचान क्या होगी?”
तीन सवाल, एक ही जवाब
गंदा पानी — बीमारी देता है
भ्रष्टाचार — लाचारी
अवैध खनन — आने वाली पीढ़ी को कर्ज़
फकीरा समझ गया—
सिस्टम अलग-अलग दिखता है,
पर जड़ एक ही है।
फकीरा की सीख
“जब पानी गंदा हो,
फाइल भारी हो,
और पहाड़ खोखले—
समझ लेना व्यवस्था बीमार है।”
फकीरा फिर चल पड़ा।
क्योंकि सड़कों पर सिर्फ़ धूल नहीं,
सवाल भी उड़ रहे हैं,
और फकीरा चलते-चलते
हर सवाल को उठाता रहेगा।














