बिहार की राजनीति पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी जीत — विपक्ष क्यों हुआ ध्वस्त?
बिहार की सियासत में इस बार जो हुआ है, वह महज़ चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि विपक्ष की राजनीतिक नाकामी पर जनता की करारी चोट है। एनडीए की 196 सीटों पर भारी बढ़त ने साफ कर दिया है कि बिहार की जनता ने इस बार “काम की राजनीति” को चुना और “कैंपेन वाली राजनीति” को सिरे से नकार दिया।
विपक्ष की स्थिति इतनी खराब क्यों हुई?
क्योंकि विपक्ष ने वही पुरानी गलती दोहराई—
चुनाव आते ही जनता को याद करो, और जैसे ही वोट पड़े, जनता को भूल जाओ।
यह “सीज़नल पॉलिटिक्स” बिहार के मतदाता अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।
तेजस्वी यादव की राजनीति भीड़ तो जुटा लेती है, लेकिन भरोसा नहीं। जनता आज भी लालू प्रसाद यादव के जंगल राज को याद करती है, और तेजस्वी उस विरासत की छाया से बाहर निकलने में नाकाम रहे। नतीजा—उम्मीदें टूटीं, और वोटर का मूड बदल गया।
उधर कांग्रेस की हालत तो और दयनीय रही। राहुल गांधी का पूरा कैंपेन “नेगेटिव नारों” पर टिका रहा—
कभी “चौकीदार चोर है”,
कभी अनगिनत आरोपों की बौछार।
लेकिन बिहार का मतदाता अब केवल आरोपों के दम पर सत्ता बदलने को तैयार नहीं है। जनता काम देखती है, रोडमैप देखती है, और विपक्ष इसके बदले केवल मंचीय तुकबंदी दे सका।

आज की तस्वीर साफ है—
🔹 एनडीए = गति + स्थिरता + जमीनी पकड़
🔹 विपक्ष = ढीला संगठन + मौसमी सक्रियता + दिशा विहीन नेतृत्व
बिहार ने जो संदेश दिया है, वह सिर्फ एक चुनावी फैसला नहीं—
यह विपक्ष के लिए चेतावनी है और सत्ता पक्ष के लिए जिम्मेदारी।
जो जनता के बीच रहेगा, वही टिकेगा।
जो सिर्फ नारों पर चलेगा, वह बिखर जाएगा।
बिहार ने लोकतंत्र को उसकी असली परिभाषा याद दिलाई हैं जनता सब जानती है, और समय आने पर जवाब देना भी जानती है।













