प्लाइवुड इंडस्ट्री में फर्जीवाड़ा कोई नई कहानी नहीं!

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प्लाइवुड इंडस्ट्री में फर्जीवाड़ा कोई नई कहानी नहीं!
मजदूरों के नाम पर कौन डकार गया 500 करोड रुपए! यमुना  टाइम्स की खोजी पड़ताल – भाग  3
कुछ संचालक खेलते रहे, विभाग सोता रहा
 राकेश भारतीय
यमुना टाइम्स ब्यूरो
यमुनानगर। यमुना टाइम्स द्वारा प्रमुखता से उठाए गए मजदूर घोटाले की प्रत्येक धीरे-धीरे हट रही है प्रदेश मे  गब्बर सिंह के नाम से पहचाने जाने वाले मंत्री अनिल विज ने भी इस मामले की जांच  किसी बड़ी एजेंसी सें कराने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा  है ।
 प्रदेश में हुए 1500 करोड़ के मजदूर घोटाले की कड़ियां जब ज़मीन पर खंगाली गईं, तो एक सच्चाई बार-बार सामने आ रही है —प्लाइवुड इंडस्ट्री में फर्जीवाड़े का खेल नया नहीं है।नया बस इतना है कि अब इसकी परतें उधड़ने लगी हैं। बता दें कि कुछ दिन पूर्व ही श्रम विभाग में एक बड़े मजदूर घोटाले का मामला सामने आया है, जिसकी शुरुआती जांच में करीब 1500 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े की आशंका जताई जा रही है, और यमुना टाइम्स बीते दो दिनों सें लगातार इस मामले को उठा रहा है । आरोप है कि यह घोटाला पूर्व श्रम मंत्री अनूप धानक के कार्यकाल के दौरान हुआ, जिसमें फर्जी मजदूर कॉपियां बनवाकर लाखों रुपये के फर्जी बिल पास किए गए।
सूत्रों के अनुसार, घोटाले का जाल प्रदेश के कई जिलों में फैला हुआ है। हिसार, कैथल, जींद, सिरसा, भिवानी, यमुनानगर  और फरीदाबाद में सबसे अधिक फर्जीवाड़ा होने की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि सरकारी योजनाओं के नाम पर मजदूरों के फर्जी नाम दर्ज कर भुगतान दिखाया गया, जबकि वास्तविक रूप से वे मजदूर अस्तित्व में ही नहीं थे।
पुराना खेल, नए तरीके
यमुनानगर की प्लाइवुड इंडस्ट्री वर्षों से प्रदेश की आर्थिक रीढ़ मानी जाती है, कई मेहनतकश संचालकों ने अपनी मेहनत से सफलता के कई कामों को हासिल किया लेकिन कुछ ब्रेस्ट प्लाईवुड फैक्ट्री के संचालक अपने भ्रष्टाचार से पूरी प्लाईवुड इंडस्ट्रीज को बदनाम करते रहे हैं, ऐसे संचालकों के कारण ही इस इंडस्ट्री को मजदूरों के सबसे बड़े दोहन केंद्र के साथा साथ सबसे भ्रष्ट इंडस्ट्रीज के रूप में रूप में देखा जाने लगा है यही कारण है कि जिन फैक्ट्री में मजदूरों को ज्यादा सुविधाएं न देनी पड़े कागजों में बेहद कम दिखाया गया था वही  सरकारी योजनाओं के लाभ लेने की बात आयी टो  मजदूरों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना, कागज़ों में सैकड़ों मजदूर, ज़मीन पर दर्जनों एक ही मजदूर को कई फैक्ट्रियों में दर्ज कराने का खेल खेला गया । इन चंद  भ्रष्ट फैक्ट्री संचालकों की राजनीतिक पहुंच कितनी है कि स्थानीय विभाग सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदकर बैठे रहते हैं यही कारण है कि इन पर प्रदेश के कई विभागों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाती हालांकि यहां कितने घोटाले की जाते हैं यह इसी बात से पता चलता है कि जीएसटी की टीम हो या अन्य केंद्रीय एजेंसी उन्होंने एक दो बार नहीं कहीं-कहीं बार या छापामारी की है ।
सूत्र बताते हैं कि कुछ प्लाइवुड संचालकों ने योजनाओं का लाभ लेने के लिए जानबूझकर फर्जी मजदूर एंट्री करवाई, लेकिन सवाल यह है कि बिना विभागीय मिलीभगत के यह कैसे संभव हुआ?
संचालक या सिस्टम — कौन ज्यादा दोषी?
प्लाइवुड इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का साफ कहना है कि“अगर कोई फैक्ट्री मालिक गलत एंट्री करता है,तो विभाग का निरीक्षक, बाबू और अधिकारी
आंखें बंद कैसे विश्वाश कर सकते हैं?”
यानी यह खेल केवल कुछ संचालकों की चालाकी नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की सहमति या चुप्पी का नतीजा है।
निरीक्षण सिर्फ कागज़ों में
सबसे गंभीर तथ्य यह है कि
निरीक्षण रिपोर्ट समय पर बनी
हस्ताक्षर पूरे थे लेकिन ज़मीनी सच्चाई कभी देखी ही नहीं गई कई मामलों में निरीक्षण एक ही दिन, एक ही समय पर, अलग-अलग फैक्ट्रियों का दिखाया गया—जो अपने आप में सवाल खड़ा करता है।
विभाग क्यों नहीं जागा?पिछले कई वर्षों में शिकायतें आईं,यूनियनों ने सवाल उठाए,स्थानीय स्तर पर आवाज़ें उठीं
लेकिन श्रम विभाग ने या तो अनसुना किया, या दबा दिया।
क्या वजह थी?
लापरवाही, दबाव या हिस्सेदारी—जांच इसी दिशा में बढ़ रही है।
अब इंडस्ट्री भी रडार पर
सूत्रों का दावा है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, केवल विभागीय अफसर ही नहीं
बल्कि कुछ प्लाइवुड फैक्ट्री संचालक भी
जांच के दायरे में आ सकते हैं। अब सवाल यह नहीं कि घोटाला हुआ या नहीं,
सवाल यह है कि कितना बड़ा हुआ और किस-किस की जानकारी में हुआ।
यमुना टाइम्स की दो टूक
यह लड़ाई न उद्योग के खिलाफ है, न मजदूर के। यह लड़ाई है फर्जीवाड़े के खिलाफ, चुप सिस्टम के खिलाफ,और मजदूरों  के नाम पर लूट के खिलाफ।
यमुना टाइम्स इस मुद्दे पर लगातार नज़र रखेगा।
(क्रमशः… भाग 4 में प्लाईवुड इंडस्ट्रीज के कुछ नटवरलालों का  एक और  कारनामा ।)
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