कुर्सी की NOC: हरियाणा की सियासत में किसकी मंज़ूरी और किसकी मजबूरी?
स्पेशल रिपोर्ट
राकेश भारतीय
यमुना टाइम्स :राजनितिक डीप ड्राइव
हरियाणा में कुर्सी की राजनीति किसी सरकारी नौकरी की तरह लगती है—
जहाँ हर फैसले से पहले एक ही सवाल पूछा जाता है:
“NOC मिली कि नहीं?” लेकिन यहाँ NOC का मतलब No Objection Certificate नहीं, बल्कि
No One’s Control
यानि ऐसी कुर्सी जिसे कोई भी एक पार्टी, एक नेता या एक गुट अपने दम पर न संभाल पाए।
तमाशा शुरू होता है चुनाव नतीजे आते ही… हालांकि हरियाणा में कभी-कभी अपने पसंदीदा राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए भी विरोधी दल में मिलने की कवायत रही है,नतीजे आते ही सबसे पहले शुरू होता है
MLA जोड़-घटाव का गणित, मानो 90 सीटों का यह खेल नहीं, बल्कि कोई बोर्ड एग्ज़ाम का रिज़ल्ट हो।
कौन पास?
कौन फेल?
कौन कंपार्ट?
कौन री-एग्ज़ाम में जाएगा?
और फिर, हर तरफ सिर्फ एक ही चीज़ चलती है—
फोन कॉल, बैठकें, हॉटेलों में मिलन, ढाबों पर चर्चा और नेताओं की तेज़ आवाजाही।
कुर्सी की NOC तय करती है कि किसकी सरकार बनेगी और किसकी नींद उड़ जाएगी।

राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि कई बार ऐसे MLA भी “सपोर्ट” दे देते हैं जिन्हें खुद पता नहीं होता कि वे किसे सपोर्ट कर रहे हैं।और अगले दिन बयान आता है—“मैंने तो केवल प्रदेश हित में समर्थन दिया है।” हरियाणा में तो आईडियोलॉजी के विपरीत भी समर्थन देने का सिलसिला चलता रहता है और अक्सर अपने समर्थकों को खुश करने के लिए बाद में समर्थन देने वाले दल के नेता कहते हैं कि मैं तो इसलिए समर्थन दिया था ताकि उनके समर्थनों के काम होते रहे चंडीगढ़ के दरवाजे खुले रहे…
आइडियोलॉजी? वह क्या होती है?
हरियाणा की राजनीति में आइडियोलॉजी को उतना ही महत्व दिया जाता है
जितना शादी में दूर के रिश्तेदार को –बुलाना ज़रूरी है, पर बैठाना ज़रूरी नहीं।एक MLA कहता है—
“हमारी विचारधारा अलग है।”
दूसरा पूछता है—
“अच्छा? कौन-सी?”जवाब मिलता है—“ये कल शाम को बताएंगे… अभी मीटिंग में हैं।”
जनता सब समझती है
हरियाणा के लोग राजनीति को TV से नहीं, ज़मीनी अनुभव से समझते हैं।
इसलिए जब कोई विधायक अचानक रात को ‘नाराज़’ और सुबह ‘तटस्थ’ होकर किसी नई बैठक में दिखाई देता है,
तो जनता कहती है—
“कुर्सी की NOC मिल गयी लगती है!”
आगे क्या?
- विशेषज्ञ कहते हैं कि आने वाले महीनों में कुर्सी की NOC फिर चर्चाओं में रहेगी।
क्योंकि हरियाणा की सियासत में एक बात तय है—
कुर्सी किसी की स्थायी संपत्ति नहीं… बस अस्थायी व्यवस्था है! वैसे प्रदेश में दिसंबर की सर्दी के बावजूद दल बदलू अपनी गतिविधियों से राजनीतिक गर्मी फिलहाल लाए हुए हैं,!















