पानी में गोते, सलाखें, बुद्धिजीवी और नेताजी

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पानी में गौते लगवाओ या पहुंचाओ सलाखो के पीछे
जब कलमकार लिखेंगे तब क्या होगा सरकार !…….

 

राकेश भारतीय

यमुना टाइम्स ब्यूरो
फकीरा चलते-चलते – भाग 2

“नेता जी की टेंशन और जनता का दर्शन”

 

आज फकीरा फिर चप्पल झाड़कर सड़क पर निकला था।
गांव का नजारा बड़ा मजेदार था —
दो जगह शादी, तीन जगह लड़ाई, एक जगह पंचायत,
और हर चौराहे पर राजनीति की मुफ्त क्लास।

देसी गांव में राजनीति मुफ्त की सलाह की तरह है—
हर किसी के पास है,
हर कोई देता है,
पर किसी के पास लागू नहीं होती।

फकीरा ने सोचा,
“चलो आज देखते हैं नेता जी की टेंशन कैसी है।”

– नेता जी और कुर्सी का रिश्ता — फिल्मों से भी ज्यादा ड्रामा

एक नेता जी मिले।
चेहरा ऐसा जैसे किसी ने उनकी चाय बिना चीनी की दे दी हो।

फकीरा बोला—
“नेता जी, परेशान क्यों?”

नेता जी बोले—
“कुर्सी का मौसम ठीक नहीं चल रहा।”

फकीरा हँस पड़ा—
“अरे साहब, हरियाणा में तो कुर्सी का मौसम कभी ठीक हुआ ही नहीं!
कभी बिजली जाती है,
कभी मंत्री जाता है,
कभी गठबंधन बनता है,
कभी गठबंधन का गठबंधन भी भाग जाता है।”

नेता जी ने गहरी सांस ली—
“जनता क्या सोच रही है, यही समझ नहीं आ रहा।”

फकीरा बोला—
“साहब, जनता वही सोच रही है जो हमेशा सोचती है—
‘आप हमें क्या समझते हैं?’
और अंत तक वही करती है जो आखिरी दिन करती है—
‘जिसे मन में आई, उसी को वोट दे देती है।’”

नेता जी ने माथा पकड़ लिया।

-जनता का दर्शन — जिसे नेता कभी समझ ही नहीं पाए

फकीरा चौपाल पर पहुँचा तो वहां चर्चा चल रही थी:

एक बुजुर्ग बोले—
“इलेक्शन में नेता आते हैं, हाथ मिलाते हैं, गले लगाते हैं,
और चुनाव बीतते ही भूल जाते हैं।”

दूसरा बोला—
“हम भी कसम खाकर कहते हैं कि इस बार धोखा नहीं खाएंगे…
पर फिर वही नेता नई टोपी पहनकर आ जाता है,
और हम फिर वही गलती कर देते हैं।”

फकीरा मुस्कुराया—
“जनता का दिल नदी जैसा है…
हर बार बहता है,
लेकिन हर बार साफ ही रहता है।”

पर नेता?
नेता का दिल तो चुनावी टंकी जैसा—
कभी भरा नहीं जाता,
और जब भरता है तो पांच साल सूखता नहीं।

 


गावं का असली मुद्दा — पर नेता जी का ध्यान कहीं और

एक किसान बोला—
“फकीरा, हमारे खेत में पानी नहीं, पर नेता जी मीटिंग में बोले—
‘हरियाणा में कोई समस्या नहीं।’”

दूसरा बोला—
“अस्पताल में डॉक्टर नहीं, स्कूल में मास्टर नहीं,
पर नेता जी कहते हैं— ‘सब बढ़िया।’”

फकीरा बोला—
“नेता जी तो आजकल मोबाइल अपडेट जैसे हो गए हैं—
हर तीन महीने में नया वर्ज़न आते हैं,
पर दिक्कतें वही पुरानी रहती हैं।”

सब हँस पड़े।
देसी हंसी का मज़ा ही अलग है—
दर्द में भी तड़का और व्यंग्य में भी मिठास।

सियासत की नई चाल – ‘जनता याद न करे’ मिशन

फकीरा ने देखा कि कई नेता जी नया प्रयोग कर रहे हैं।
उनका मिशन है:

“जनता हमें याद न करे, पर वोट जरूर दे।”

इसलिए चुनाव से पहले:

सड़कों पर नए बोर्ड

गांव में नई घोषणा

शहर में नए फोटो

और मीडिया में नई मुस्कान

लेकिन जनता अब चतुर हो गई है।

एक नौजवान बोला—
“हम नेता को उसके काम से पहचानेंगे,
कोट-पतलून से नहीं।”

दूसरा बोला—
“चुनाव में आए हो, ठीक है…
पर बाद में भी कभी गांव आकर चाय पी लेना।”

नेता जी खामोश।
कॉफी मशीन से निकले हुए दूध की तरह।

फकीरा का निष्कर्ष (आज की सीख)

फकीरा चल पड़ा और चलते-चलते बोला—

> “नेता जी को जनता की टेंशन है,
और जनता को नेता जी की कहानी…
चुनाव आते ही दोनों की किस्मत खुलती है,
और जाते ही दोनों अपनी-अपनी राह चल देते हैं।”

 


जब कलमकार लिखेंगे तब क्या होगा सरकार !

नेता किसी भी राजनीतिक दल से जुडा हो मीठा मीठा हड़प और कड़वा कड़वा थू ही करता है! फकीरा ठिठुरता हुआ अपनी मस्त चाल चला जा रहा था कि एक स्थान पर कुछ लोगों ने उसे रोका और अदरक वाली चाय पीने का ऑफर दिया तो फकीरा के पांव थम गए तभी एक बुजुर्ग ने कहा कि फकीरा कोई दूसरे दल का नेता यदि अपना गुणगान सुनता रहे तो खुश रहता है लेकिन आलोचना सुनते ही मानो आपातकाल लगा देता है ऐसे नेताओं को कई नेता हमेशा याद रखने वाला कहते हैं, उसकी आलोचना करते है लेकिन यदि खुद इन पर बीते तो यह सब कुछ भूल जाते हैं,ऐसा ही एक नेताजी के साथ हो रहा है जिसे लोग सरकार समझते हैं लेकिन यह सरकार अभी विपक्षी नेता की तरह है जिसे केवल अपना गुणगान सुनना पसंद है!

  1. कौन बनेगा गांव का चौधरी

अपने विरुद्ध लिखने वाले बुद्धिजीवियों को अपनी कुर्सी का रौब दिखाते हुए कभी पानी में गोते लगवाता है तो कभी किसी बुद्धिजीवी को सलाखों के पीछे पहुंचाता है! प्रदेश के नेताओं ने पहले ही मीडिया घरानो के दांत और नाखून निकल लिए हैं जिसके चलते लोग इन्हें गोदी मीडिया तक कहने लगे हैं लेकिन इसके बावजूद यदि कोई बेचारा बुद्धिजीवी यदि अपने स्तर पर हल्का-फुल्का विरोध का प्रयास करें भी तो ऐसे नेताओं के पेट में दर्द हो जाता है! ऐसा ही दर्द एक नेता रुपी सरकार को तब हुआ जब एक बुद्धिजीवी ने लोकतंत्र में अपनी पसंद की एक वीडियो शेयर कर दी बस फिर क्या था खाकी को हथियार बनाकर पहुंचा दिया गया सलाखों के पीछे, फकीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह बुजुर्ग किस नेता,सरकार और बुद्धिजीवी की बात कर रहे हैं इस बीच किसी ने फकीरा से कहा कि फकीरा यह नेता लोग वक्त से भी नहीं डरते क्योंकि वक्त बहुत बलवान होता है और इसकी मार से कोई अछूता नहीं रहा आदमी को हमेशा वक्त से डर कर रहना चाहिए,ऐसे नेताओं के बारे में तुम कुछ बोलते क्यों नहीं तो फ़कीरा ने कुछ ना समझते हुए भी कहा कि करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भयो उदास और आगे चल दिया….

फकीरा फिर अगले मोड़ पर मुड़ गया।
जीवन, सड़क और राजनीति
तीनों कहीं न कहीं
एक ही दिशा में भटकते रहते हैं।

भाग 3 अगले रविवार फिर आएगा फकीरा …
फकीरा के पास अभी और भी किस्से हैं इसके अलावा फकीरा जब आपके गांव में आपकी कॉलोनी में आए तो उसे अपने साथ अफसरो,नेताओं संग बीती, आप बीती अवश्य बताना क्योंकि जिसकी कोई नहीं सुनता फकीरा परमपिता परमेश्वर के आशीर्वाद से उसकी सुनने जरूरत आता है ।

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