महालक्ष्मी और जीवित पुत्रिका व्रत एक साथ, दो कथाओं का एक ही फल

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यमुना टाइम्स विशेष: शनिवार को महालक्ष्मी और जीवित पुत्रिका व्रत एक साथ, दो कथाओं का एक ही फल
 यमुना टाइम्स ब्यूरो
यमुनानगर(राकेश भारतीय ) “हमारे पर्व, हमारे त्यौहार… यूं तो पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश देते हैं और इसी संदेश का सबसे खूबसूरत उदाहरण है आज का दिन।
आज है सुतरे वाला महालक्ष्मी जी का व्रत, जिसे यूपी-बिहार में जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। नाम भले ही अलग-अलग हों, राज्य भले ही अलग-अलग हों, पर माताओं की अपने बच्चों के लिए लंबी उम्र और सुख की प्रार्थना का ही दिन है आज का व्रत ।
आश्विन कृष्ण अष्टमी शनिवार को दो बड़े व्रत एक साथ पड़ रहे हैं। यूपी, पंजाब और हरियाणा में इसे महालक्ष्मी व्रत के समापन के रूप में मनाया जाता है, जिसमें पीले धागे (सूत्र) की महिमा है। वहीं बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी में इसी दिन को जीवित पुत्रिका / जितिया / जिउतिया व्रत के नाम से जाना जाता है, जो संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि दोनों व्रतों का मूल उद्देश्य सुख-समृद्धि और संतान-सुख ही है।
1. महालक्ष्मी व्रत की कथा – राजा मंगलसेन वाली जो उत्तर भारत में प्रसिद्ध है: राजा मंगलसेन को कोई संतान नहीं थी। जंगल में पीपल के नीचे व्रत करती महिलाओं से उसे पीला सूत्र मिला। रानी ने घमंड में उस सूत्र को फेंक दिया, नौकरानी ने श्रद्धा से बांध लिया तो उसके घर धन-धान्य भर गया। राजा ने रानी को महल से निकाला, बाद में रानी ने पश्चाताप कर 16 दिन विधि से व्रत किया तो महालक्ष्मी प्रसन्न हुईं और उसे पुत्र रत्न मिला।
2. जीवित पुत्रिका (जितिया) व्रत की कथा – जो बिहार में कही जाती है:
इस व्रत की दो कथाएं मुख्य हैं:
अ) राजा जीमूतवाहन की कथा: गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन बड़े दयालु थे। एक दिन जंगल में उन्हें एक नागमाता रोती मिली। पता चला कि रोज एक नाग को गरुड़ का भोजन बनना पड़ता है और आज उसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है। जीमूतवाहन ने उस पुत्र के वस्त्र में लिपटकर स्वयं को बलि के लिए प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ जब उसे ले गए तो देखा कि यह नाग चीख नहीं रहा। परिचय पूछने पर जीमूतवाहन ने सारी बात बताई। गरुड़ उनकी दया से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने नागों की बलि लेना हमेशा के लिए बंद कर दिया और जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। तभी से माताएं अपने पुत्र पर आया संकट टालने के लिए यह व्रत करती हैं।
ब) चील और सियारिन की कथा: नर्मदा किनारे पाकड़ के पेड़ पर एक चील और नीचे एक सियारिन रहती थी। दोनों ने जितिया व्रत का संकल्प लिया। व्रत के दिन श्मशान में मुर्दा देखकर सियारिन भूख रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया, पर चील ने नियम निभाया। अगले जन्म में चील बनी शीलवती जिसके 7 पुत्र जीवित रहे और सियारिन बनी कपुरावती जिसके बच्चे मर जाते थे। बाद में जीमूतवाहन जी ने ही शीलवती के पुत्रों को जीवित किया।
ग) महाभारत से जुड़ी मान्यता:अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था, तब श्रीकृष्ण ने अपने पुण्यों से उस मृत गर्भ को जीवित किया। वह बालक ही राजा परीक्षित बना, इसीलिए इसे जीवित पुत्रिका कहा गया।
शनिवावर  को पीला धागा बांधने वाला महालक्ष्मी व्रत और संतान की रक्षा वाला जितिया व्रत एक ही दिन है। यूपी-पंजाब में धागे की कथा और बिहार में जीमूतवाहन की कथा सुनने की परंपरा है, फल दोनों का एक ही – घर में धन, संतान सुख और समृद्धि।
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