मोटी मलाई खाने वाले अधिकारियों की बढ़ी चिंता, अवैध कॉलोनियों और फर्जी रजिस्ट्री नेटवर्क पर बड़े एक्शन के संकेत
भू माफिया और अधिकारियों की मिली भगत पर यमुना टाइम्स में सिलसिले वर चलाई सीरीज में उजागर किए थे भ्रष्टाचार के मामले
राकेश भारतीय
चंडीगढ़/यमुनानगर : हरियाणा में “गब्बर” के नाम से प्रसिद्ध ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज द्वारा यमुनानगर में की गई सख्त कार्रवाई अब पूरे प्रदेश में भू-माफियाओं और उनसे कथित मिलीभगत रखने वाले अधिकारियों के लिए बड़ी चेतावनी बनती दिखाई दे रही है। यमुनानगर की ग्रीवेंस कमेटी बैठक में सामने आए एक मामले ने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रदेशभर में वर्षों से चल रहे अवैध कॉलोनी कारोबार की परतें भी उधेड़ दी हैं।
मंत्री विज का गुस्सा किसी सामान्य शिकायत पर नहीं फूटा था। मामला कृषि भूमि पर अवैध प्लाटिंग, नियमों की अनदेखी और सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाने से जुड़ा था। शिकायत की सुनवाई के दौरान जब संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया तो वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। रिकॉर्ड में कृषि भूमि दर्ज होने के बावजूद वहां आवासीय प्लॉटों की रजिस्ट्रियां कैसे हुईं, अवैध कॉलोनियां कैसे विकसित हुईं और जिम्मेदार विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की, इन सवालों का जवाब अधिकारियों के पास नहीं था। इसी के बाद अनिल विज ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश देकर स्पष्ट संकेत दे दिया कि अब लापरवाही या मिलीभगत किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हर जिले में फैला है अवैध कॉलोनियों का जाल
हरियाणा के लगभग हर जिले, कस्बे और गांव में कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनियां काटे जाने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। आरोप है कि भू-माफिया किसानों से अपेक्षाकृत कम कीमत पर जमीन खरीदते हैं और बाद में उसे आवासीय या व्यावसायिक प्लॉटों में बदलकर कई गुना कीमत पर बेच देते हैं। इस पूरे खेल में नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया जाता है।
कई स्थानों पर खुलेआम टेबल-कुर्सियां लगाकर महीनों तक प्लॉट बेचे जाते हैं, लेकिन संबंधित विभागों की कार्रवाई नजर नहीं आती। परिणामस्वरूप आम लोग अपनी जीवनभर की कमाई ऐसे प्लॉटों में निवेश कर देते हैं, जिनकी वैधता बाद में सवालों के घेरे में आ जाती है।
सरकारी खजाने पर दोहरी मार
अवैध कॉलोनियों का सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने को होता है। नियमों के अनुसार कॉलोनी विकसित करने वाले डेवलपर को सड़क, पार्क, नालियां, बिजली, पानी और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाएं स्वयं विकसित करनी होती हैं। लेकिन अवैध कॉलोनियों में ऐसा नहीं होता।
समय बीतने के साथ जब इन कॉलोनियों में आबादी बस जाती है, तब जनता की जरूरतों को देखते हुए सरकार को करोड़ों रुपये खर्च कर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करानी पड़ती हैं। यानी निजी लाभ कुछ लोगों की जेब में जाता है और खर्च जनता के टैक्स के पैसे से किया जाता है।
पर्दे के पीछे कौन हैं असली खिलाड़ी?
जानकारों का मानना है कि अवैध कॉलोनियों का कारोबार केवल छोटे प्रॉपर्टी डीलरों तक सीमित नहीं है। कई मामलों में पर्दे के पीछे बड़े आर्थिक हित, प्रभावशाली लोग और राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। जमीन खरीदने से लेकर प्लॉट बेचने और रजिस्ट्रियां करवाने तक का पूरा नेटवर्क संगठित तरीके से काम करता है।
यदि इस पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच होती है तो कई बड़े नामों का सामने आना तय माना जा रहा है। यही कारण है कि यमुनानगर में हुई कार्रवाई को केवल एक जिले तक सीमित घटना नहीं, बल्कि बड़े अभियान की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
क्या कहते हैं नियम?
हरियाणा में दो एकड़ या उससे अधिक कृषि भूमि पर कॉलोनी विकसित करने के लिए नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग से सीएलयू (चेंज ऑफ लैंड यूज) और लाइसेंस लेना अनिवार्य है। इसके अलावा सड़कों, पार्कों, सीवरेज, बिजली और जलापूर्ति जैसी सुविधाओं का विकास भी नियमानुसार करना होता है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए प्लॉट आरक्षित करना भी कई योजनाओं के तहत अनिवार्य प्रावधान है। लेकिन अवैध कॉलोनाइजर इन नियमों का पालन किए बिना सीधे प्लॉट बेचने का काम शुरू कर देते हैं।
फर्जी प्रॉपर्टी आईडी और रजिस्ट्रियों पर भी उठ रहे सवाल
प्रदेश में लागू की गई प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था का उद्देश्य संपत्तियों का डिजिटल और पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार करना था। लेकिन आरोप यह भी हैं कि कुछ मामलों में प्रभाव और पैसे के दम पर गलत प्रॉपर्टी आईडी बनवाई जाती हैं, जिसके बाद रजिस्ट्रियों का रास्ता आसान हो जाता है।
यदि इस पहलू की गंभीर जांच हुई तो निकाय विभाग, तहसीलों और अन्य संबंधित कार्यालयों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ सकती है।
कृषि भूमि घटने का असर महंगाई पर भी
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि पर लगातार बढ़ते निर्माण कार्यों का सीधा प्रभाव खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ता है। एक ओर खेती योग्य भूमि घट रही है तो दूसरी ओर आबादी लगातार बढ़ रही है। मांग और आपूर्ति के इस असंतुलन का असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देता है। इसलिए अवैध कॉलोनियों का मुद्दा केवल भूमि उपयोग का नहीं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
प्रदेश स्तर पर बड़े अभियान की संभावना
यमुनानगर में अनिल विज द्वारा दिखाए गए सख्त तेवरों के बाद चर्चा है कि प्रदेशभर में अवैध कॉलोनियों, भू-माफियाओं, फर्जी प्रॉपर्टी आईडी नेटवर्क और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की व्यापक जांच करवाई जा सकती है। यदि ऐसा हुआ तो कई सफेदपोश चेहरे, कई प्रभावशाली लोग और अनेक अधिकारी-कर्मचारी बेनकाब हो सकते हैं।

अनिल विज की पहचान ऐसे नेता के रूप में रही है जो शिकायत मिलने पर अपनी ही सरकार के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटते। ऐसे में यमुनानगर की कार्रवाई को एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि अब जनता की जमीन, सरकारी राजस्व और कानून के साथ खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्रवाई का दौर शुरू हो सकता है।














