क्या अनिल विज की ‘राजनीतिक खुराक’ कम करने की कोशिश?

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‘सादर आमंत्रित हैं’ से ‘सूचनाार्थ प्रेषित’ तक… आखिर क्या संदेश देना चाहता है विभाग?

अनिल विज की कवरेज पर असर डालने की कोशिश या महज शब्दों का बदलाव? यमुनानगर में छिड़ी बहस

क्या मीडिया और नेताओं के बीच बढ़ रही है दूरी? यमुनानगर डीपीआरओ की नई कार्यप्रणाली चर्चा में

राकेश भारतीय
यमुनानगर : हरियाणा सरकार के सबसे चर्चित और बेबाक नेताओं में शुमार कैबिनेट मंत्री अनिल विज हमेशा अपने बयानों और जनता से सीधे संवाद के कारण सुर्खियों में रहते हैं। लेकिन यमुनानगर में सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग की कार्यशैली को लेकर अब कई सवाल उठने लगे हैं।
पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि विभाग द्वारा भेजी जाने वाली सूचनाओं की भाषा में अचानक बदलाव क्यों किया गया है? पहले जहां विभागीय संदेशों में “आप प्रेस कवरेज के लिए सादर आमंत्रित हैं” लिखा जाता था, वहीं अब केवल “सादर सूचनाार्थ प्रेषित” लिखकर औपचारिकता निभाई जा रही है।
पत्रकारों का एक वर्ग इसे महज शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि मीडिया और सरकार के बीच संवाद की परंपरा में बदलाव के रूप में देख रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पत्रकारों को कार्यक्रमों से दूरी बनाने का अप्रत्यक्ष संदेश दिया जा रहा है, या फिर यह केवल स्थानीय स्तर पर अपनाई गई नई कार्यशैली है?
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि यदि पत्रकारों को औपचारिक रूप से आमंत्रित नहीं किया जाएगा तो स्वाभाविक रूप से कार्यक्रमों की कवरेज भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में क्या सरकार के उन नेताओं की सक्रियता और बयान भी सुर्खियों से दूर हो जाएंगे, जो मीडिया के माध्यम से जनता तक अपनी बात पहुंचाते हैं?
गौरतलब है कि पूर्व में भी हरियाणा के एक जिले में पत्रकारों को मंत्री अनिल विज के कार्यक्रम से दूर रखने का मामला सामने आया था। उस समय स्वयं अनिल विज ने संबंधित अधिकारी को तलब करते हुए कहा था कि “पत्रकार और मीडिया ही नेताओं की खुराक होते हैं, इन्हें दूर क्यों रखा जा रहा है?”


यमुनानगर में भी अब कुछ पत्रकारों का कहना है कि विभाग की वर्तमान कार्यशैली मीडिया और प्रशासन के बीच दूरी बढ़ा रही है। मीडिया सेंटर की बदहाल व्यवस्था, कंप्यूटर और प्रिंटर जैसी सुविधाओं की कमी तथा पत्रकारों से संवादहीनता को लेकर भी लंबे समय से असंतोष बना हुआ है।

यमुनानगर डीपीआईआरओ द्वारा कल भेजे गए संदेश की फोटो

हालांकि राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि सरकार की ओर से पत्रकारों को दूर रखने जैसा कोई निर्देश नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल शब्दों का बदलाव है, या फिर इसके पीछे कोई और रणनीति काम कर रही है?
फिलहाल इस पूरे मामले में जिला जनसंपर्क अधिकारी का पक्ष आना बाकी है। यदि विभाग की ओर से कोई प्रतिक्रिया आती है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

 

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